पाकिस्तान में बढ़ती सैन्य ताकत पर मौलाना फजलुर रहमान का हमला, बोले- सरकार की शक्तियां असीम मुनीर को सौंपी जा रहीं

इस्लामाबाद। पाकिस्तान की जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (JUI-F) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने सेना प्रमुख और फील्ड मार्शल असीम मुनीर की बढ़ती शक्तियों को लेकर शहबाज शरीफ सरकार पर तीखा हमला बोला है। संयुक्त विपक्ष की बैठक में रहमान ने आरोप लगाया कि संघीय सरकार की शक्तियां धीरे-धीरे सेना प्रमुख को सौंपी जा रही हैं और इससे पाकिस्तान में लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर हो रही है।

‘मुनीर के पास जा रही हैं सरकार की शक्तियां’

फजलुर रहमान ने कहा कि सेना, नौसेना और वायुसेना में नियुक्तियों से जुड़े नियमों में बदलाव किए गए हैं। उनके मुताबिक, ऐसे अधिकार भी सैन्य नेतृत्व को दिए जा रहे हैं जो पहले सरकार के पास थे। उन्होंने इसे सत्ता के केंद्रीकरण की दिशा में उठाया गया कदम बताया।

रहमान ने कहा कि वह 1988 से संसद में हैं और उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत जनरल जिया-उल-हक के मार्शल लॉ के खिलाफ आंदोलन से हुई थी। उन्होंने कहा कि जिस तरह उस दौर में सैन्य शासन का विरोध किया गया था, उसी तरह अब भी देश में सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष की जरूरत है।

‘असीम मुनीर के पास कई अहम जिम्मेदारियां’

मौलाना फजलुर रहमान ने असीम मुनीर की मौजूदा भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि वह अब केवल सेना प्रमुख नहीं हैं, बल्कि फील्ड मार्शल और सशस्त्र बलों से जुड़ी अहम जिम्मेदारियां भी उनके पास हैं।

उन्होंने सवाल किया कि जब सत्ता और निर्णय लेने की इतनी शक्तियां एक ही व्यक्ति के पास हों तो प्रधानमंत्री और कैबिनेट की भूमिका क्या रह जाती है। रहमान के मुताबिक, विपक्ष को इस मुद्दे पर साझा रणनीति बनानी होगी, वरना इसी तरह के कानून और फैसले आगे भी आते रहेंगे।

विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश

फजलुर रहमान पिछले कुछ समय से पाकिस्तान के विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। वह इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) समेत विपक्षी दलों के साथ समन्वय बढ़ाने के पक्ष में हैं।

रहमान का मुख्य विरोध उन संवैधानिक और कानूनी बदलावों से है, जिनके जरिए उनके मुताबिक सैन्य नेतृत्व की शक्तियां बढ़ी हैं। उनका कहना है कि विपक्ष के एकजुट हुए बिना इन फैसलों का राजनीतिक रूप से प्रभावी विरोध करना मुश्किल होगा।

पाकिस्तानी सेना के पुराने रिकॉर्ड का भी किया जिक्र

मौलाना फजलुर रहमान हाल के दिनों में पाकिस्तानी सेना के दावों और उसके राजनीतिक प्रभाव पर भी सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने 1971 के युद्ध का उदाहरण देते हुए पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व के बयानों और उसके बाद हुए आत्मसमर्पण का जिक्र किया था।

उन्होंने तंज कसते हुए कहा था कि पाकिस्तान की सेना के बयानों और वास्तविक घटनाक्रम में अंतर का इतिहास रहा है और 1971 में भी ऐसा ही हुआ था।

क्या बढ़ेगी मुनीर की राजनीतिक चुनौती?

फजलुर रहमान करीब चार दशकों से पाकिस्तान की राजनीति में सक्रिय और प्रभावशाली नेता रहे हैं। गठबंधन बनाने और अलग-अलग राजनीतिक दलों के बीच बातचीत कराने की उनकी क्षमता के कारण उन्हें अक्सर ‘किंगमेकर’ की भूमिका में देखा जाता है।

ऐसे में अगर वह विपक्षी दलों को एक साझा मंच पर लाने में सफल होते हैं, तो इससे शहबाज शरीफ सरकार और सैन्य नेतृत्व पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, विपक्षी एकजुटता कितनी प्रभावी होती है और इसका पाकिस्तान की सत्ता व्यवस्था पर कितना असर पड़ता है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।

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