GDP आंकड़ों पर रघुराम राजन का बड़ा सवाल, बोले- “कुछ तो गड़बड़ है”

भारत की अर्थव्यवस्था भले ही वित्त वर्ष 2025-26 में 7.7% GDP ग्रोथ दर्ज करने का दावा कर रही हो, लेकिन पूर्व RBI गवर्नर रघुराम राजन इन आंकड़ों को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। उनका कहना है कि आधिकारिक GDP डेटा और जमीनी आर्थिक हालात के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।

एक इंटरव्यू में राजन ने कहा, अगर अर्थव्यवस्था वास्तव में इतनी तेजी से बढ़ रही होती, तो निवेश में भी उसी अनुपात में बढ़ोतरी दिखनी चाहिए थी। कुछ तो गड़बड़ है।

GDP ग्रोथ और निवेश के बीच क्यों है अंतर?

रघुराम राजन का मानना है कि कॉर्पोरेट निवेश में सुस्ती इस बात का संकेत है कि बाजार में मांग उतनी मजबूत नहीं है, जितनी सरकारी आंकड़े दिखा रहे हैं। उनके मुताबिक कारोबारी निवेशकों का व्यवहार अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति को बेहतर तरीके से दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि यदि कंपनियों को भविष्य में मजबूत मांग की उम्मीद होती, तो वे बड़े पैमाने पर निवेश करतीं। लेकिन मौजूदा हालात इसके विपरीत संकेत दे रहे हैं।

FDI में गिरावट पर भी जताई चिंता

पूर्व RBI प्रमुख ने Foreign Direct Investment (FDI) में आई गिरावट को भी चिंता का विषय बताया। उनका कहना है कि भारत के पास 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य तो है, लेकिन उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए स्पष्ट और ठोस आर्थिक रोडमैप नजर नहीं आता।

नई GDP सीरीज पर उठे सवाल

राजन की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत सरकार ने नई GDP सीरीज के तहत मजबूत आर्थिक वृद्धि के आंकड़े पेश किए हैं। नई श्रृंखला में 2022-23 को बेस ईयर माना गया है और इसमें उपभोक्ता खर्च, डिजिटल अर्थव्यवस्था और महामारी के बाद बदले आर्थिक व्यवहार को शामिल किया गया है।

7.7% ग्रोथ के बावजूद निवेश क्यों नहीं बढ़ा?

ताजा आंकड़ों के अनुसार, FY 2025-26 में भारतीय अर्थव्यवस्था 7.7% की दर से बढ़ी, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह वृद्धि 7.1% रही थी। वहीं जनवरीमार्च तिमाही में GDP ग्रोथ 7.8% दर्ज की गई।

हालांकि, राजन का कहना है कि यदि अर्थव्यवस्था वास्तव में इतनी तेज गति से आगे बढ़ रही है तो कॉर्पोरेट निवेश में उल्लेखनीय उछाल दिखाई देना चाहिए था, जो फिलहाल नजर नहीं रहा।

“10 साल पुरानी पहेली आज भी कायम

रघुराम राजन ने कहा कि भारत में कॉर्पोरेट निवेश की कमी पिछले एक दशक से सबसे बड़ा अनसुलझा सवाल बनी हुई है।

उन्होंने कहा, “10 साल पहले भी यह सवाल था कि कंपनियां निवेश क्यों नहीं कर रही हैं और आज भी यही स्थिति है। यदि आधिकारिक ग्रोथ आंकड़े सही तस्वीर दिखाते हैं, तो निवेश का स्तर कहीं अधिक होना चाहिए था।

उनके अनुसार, निवेशकों की सतर्कता इस ओर इशारा करती है कि आर्थिक विकास के आधिकारिक आंकड़े और वास्तविक आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह एकदूसरे से मेल नहीं खा रहीं।

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