मेडिकल साइंस का कमाल: सुअर की किडनी ने 271 दिन तक बचाए रखी इंसान की जान, बना ‘ब्रिज ट्रांसप्लांट’ का रिकॉर्ड

नई दिल्ली। दुनियाभर में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए जरूरी अंगों की कमी लाखों मरीजों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। ऐसे समय में मेडिकल साइंस से आई एक खबर नई उम्मीद जगाती है। अमेरिका में डॉक्टरों ने आनुवंशिक रूप से बदली गई सुअर की किडनी को 66 वर्षीय किडनी फेलियर मरीज के शरीर में ट्रांसप्लांट किया। यह किडनी 271 दिनों तक काम करती रही, जिससे मरीज लंबे समय तक डायलिसिस से दूर रह सका।

सबसे खास बात यह रही कि सुअर की किडनी को स्थायी विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि एक ‘ब्रिज’ यानी पुल के रूप में इस्तेमाल किया गया। बाद में जब इंसानी डोनर की किडनी उपलब्ध हुई तो मरीज का ह्यूमन किडनी ट्रांसप्लांट किया गया।

किडनी की कमी के बीच बड़ी उम्मीद

एंड-स्टेज किडनी डिजीज से जूझ रहे मरीजों के लिए किडनी ट्रांसप्लांट को डायलिसिस की तुलना में बेहतर उपचार माना जाता है। लेकिन जरूरत के मुकाबले इंसानी किडनी की उपलब्धता काफी कम है। यही वजह है कि कई मरीजों को लंबे समय तक डायलिसिस पर रहना पड़ता है और कुछ मरीजों को समय पर डोनर अंग नहीं मिल पाता।

इसी चुनौती को देखते हुए वैज्ञानिक लंबे समय से जेनोट्रांसप्लांटेशन पर काम कर रहे हैं। इसमें एक प्रजाति के अंग को दूसरी प्रजाति के शरीर में ट्रांसप्लांट किया जाता है।

66 वर्षीय मरीज में किया गया प्रयोग

अमेरिका के 66 वर्षीय टिम एंड्रयूज टाइप-2 डायबिटीज के कारण गंभीर किडनी बीमारी से जूझ रहे थे। उनकी स्थिति ऐसी थी कि उन्हें तत्काल इंसानी किडनी मिलने की संभावना कम थी और लंबे समय तक डायलिसिस पर रहना भी जोखिम भरा हो सकता था।

ऐसे में डॉक्टरों ने आनुवंशिक रूप से बदली गई सुअर की किडनी को उनके शरीर में ट्रांसप्लांट करने का फैसला किया।

रिपोर्ट के मुताबिक, सुअर की किडनी के आनुवंशिक ढांचे में 69 बदलाव किए गए थे। इसका उद्देश्य अंग को मानव शरीर के लिए ज्यादा अनुकूल बनाना और शरीर द्वारा उसे रिजेक्ट किए जाने के जोखिम को कम करना था।

271 दिन तक करती रही काम

25 जनवरी 2025 को ट्रांसप्लांट के बाद सुअर की किडनी ने तुरंत काम करना शुरू कर दिया। सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि किडनी ने 271 दिनों तक मरीज के शरीर में काम किया

इस दौरान एंड्रयूज करीब नौ महीने तक डायलिसिस से दूर रहे। उनकी हालत में सुधार हुआ और वह खाना बनाने तथा घर की सफाई जैसे रोजमर्रा के काम भी कर पा रहे थे।

उनके लिए यह प्रयोग महज एक मेडिकल प्रक्रिया नहीं था, बल्कि सामान्य जिंदगी की ओर लौटने का मौका था।

फिर मिली इंसानी किडनी

हालांकि बाद में सुअर की किडनी की रक्त वाहिकाओं में नुकसान के संकेत दिखाई देने लगे। आखिरकार डॉक्टरों को उसे निकालना पड़ा और कुछ समय के लिए एंड्रयूज को फिर डायलिसिस का सहारा लेना पड़ा।

इसी बीच उन्हें एक इंसानी डोनर की किडनी उपलब्ध हो गई। इसके बाद उनका ह्यूमन किडनी ट्रांसप्लांट किया गया, जो रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल अच्छी तरह काम कर रही है।

यही वजह है कि इस प्रक्रिया को ‘ब्रिज ट्रांसप्लांट’ कहा जा रहा है—यानी सुअर की किडनी ने उस मुश्किल दौर में मरीज का साथ दिया, जब तक उसके लिए इंसानी किडनी उपलब्ध नहीं हो गई।

वैज्ञानिकों को क्यों दिख रही है नई उम्मीद?

मैसाचुसेट्स जनरल ब्रिघम के ट्रांसप्लांटेशन साइंसेज और नेफ्रोलॉजी विशेषज्ञों के मुताबिक, अंगों की कमी ट्रांसप्लांट मेडिसिन की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जेनोट्रांसप्लांटेशन भविष्य में इस समस्या का एक संभावित समाधान बन सकता है। शुरुआती दौर में इसका इस्तेमाल उन मरीजों के लिए ‘ब्रिज’ के तौर पर किया जा सकता है, जिन्हें इंसानी डोनर किडनी मिलने तक डायलिसिस से बचाना जरूरी हो।

अगर भविष्य के शोध यह साबित कर देते हैं कि आनुवंशिक रूप से बदली गई सुअर की किडनियां लंबे समय तक सुरक्षित और प्रभावी तरीके से काम कर सकती हैं, तो यह तकनीक किडनी ट्रांसप्लांट की दुनिया में बड़ा बदलाव ला सकती है।

क्या सुअर की किडनी बन सकती है स्थायी विकल्प?

फिलहाल इसका जवाब नहीं, क्योंकि यह तकनीक अभी शोध और क्लिनिकल विकास के दौर में है। लेकिन 271 दिनों तक किडनी का काम करना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि जरूर माना जा रहा है।

आज जहां हजारों-लाखों मरीज इंसानी डोनर किडनी के इंतजार में हैं, वहीं ऐसी तकनीक भविष्य में उनके लिए एक अस्थायी सहारा ही नहीं, बल्कि संभवतः स्थायी उपचार का रास्ता भी खोल सकती है।

एंड्रयूज के लिए यह अनुभव किसी चमत्कार से कम नहीं रहा। उनके मुताबिक, इस ट्रांसप्लांट ने उन्हें लंबे समय बाद सामान्य जिंदगी जीने का मौका दिया।

इससे पहले भी हो चुके हैं ऐसे प्रयोग

जेनोट्रांसप्लांटेशन को लेकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कई प्रयोग किए जा रहे हैं। चीन में शोधकर्ताओं ने एक ब्रेन-डेड व्यक्ति में आनुवंशिक रूप से बदले गए सुअर के लिवर और किडनी का एक साथ ट्रांसप्लांट भी किया था। प्रयोग के दौरान इन अंगों ने कुछ दिनों तक काम किया।

इन प्रयोगों से यह संकेत मिलता है कि भविष्य में आनुवंशिक रूप से तैयार किए गए पशु अंग इंसानी अंगों की कमी को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, इन्हें व्यापक चिकित्सा उपचार का हिस्सा बनाने से पहले सुरक्षा, संक्रमण, अंग की दीर्घकालिक कार्यक्षमता और शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया जैसे कई सवालों के जवाब तलाशना अभी बाकी है।

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