पंजाब में एक rape case को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। मामले में 5 करोड़ रुपये की कथित मांग, मुख्यमंत्री भगवंत मान की पत्नी गुरप्रीत कौर के नाम का उल्लेख और NHRC की जांच की मांग ने इसे सुर्खियों में ला दिया है।
National Human Rights Commission (NHRC) ने पंजाब के मुख्य सचिव और पुलिस प्रमुख को नोटिस जारी कर पूरे मामले की जांच करने और दो सप्ताह के भीतर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट पेश करने को कहा है।
NHRC के सदस्य प्रियांक कानूनगो ने ANI से बातचीत में बताया कि आयोग ने मामले से जुड़ी जानकारी Union Home Ministry को भी भेज दी है। उन्होंने आरोपों को गंभीर बताते हुए कहा कि मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
NHRC तक कैसे पहुंचा मामला?
आयोग के अनुसार, उसे Legal Rights Observatory (LRO) की ओर से शिकायत मिली थी। शिकायत में दावा किया गया कि रिटायर्ड हाई कोर्ट जज रंजीत सिंह ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि एक rape case को दबाने के लिए 5 करोड़ रुपये मांगे गए थे और इस कथित मामले में मुख्यमंत्री की पत्नी का नाम सामने आया है।
LRO ने आरोपों की स्वतंत्र जांच की मांग की। संगठन का कहना है कि इन आरोपों का असर criminal justice system की विश्वसनीयता पर पड़ सकता है।
FIR और गिरफ्तारी का पूरा घटनाक्रम
मामले में kidnapping and rape के आरोपों को लेकर अमृतसर में 29 अप्रैल को FIR दर्ज की गई थी। इसके बाद 1 मई को लड़की को बरामद किया गया और 13 मई को मोहाली निवासी आरोपी को गिरफ्तार किया गया।
रिटायर्ड जज रंजीत सिंह ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि लड़की के पिता ने Punjab and Haryana High Court में याचिका दाखिल कर जांच CBI को सौंपने की मांग की थी। याचिका में स्थानीय पुलिस की जांच पर सवाल उठाए गए थे।
सिंह के मुताबिक, याचिका में आरोप लगाया गया था कि FIR रद्द करवाने के लिए मुख्यमंत्री की पत्नी की ओर से आरोपी से 5 करोड़ रुपये मांगे गए। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि यह उनका व्यक्तिगत आरोप नहीं बल्कि याचिका में दर्ज दावा है।
याचिका में क्या आरोप लगाए गए?
30 जून को 55 वर्षीय व्यक्ति ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इसमें आरोप लगाया गया कि मोहाली निवासी गुरिंदर सिंह उर्फ गुरी चहल ने उसकी बेटी का अपहरण किया और उसके साथ rape किया। आरोप है कि आरोपी ने लड़की से शादी करने का वादा भी किया था।
याचिका में यह भी दावा किया गया कि आरोपी के पास लड़की की निजी तस्वीरें थीं और उनका इस्तेमाल उसे blackmail करने के लिए किया जा रहा था।
शिकायतकर्ता के वकील सौरभ अरोड़ा के मुताबिक, आरोपी की गिरफ्तारी के बावजूद पुलिस ने मामले की निष्पक्ष जांच नहीं की। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि बाद में आरोपी को जेल से बाहर कर दिया गया।
मामले में चहल के दोस्त सिमरनजीत सिंह हुंदल और मुख्यमंत्री की पत्नी के कथित रिश्तेदार अमरदीप सिंह ग्रेवाल को भी पक्ष बनाया गया।
राजनीतिक प्रभाव और पैसों की मांग का आरोप
याचिका में आरोप लगाया गया कि आरोपियों की ओर से अमृतसर पुलिस पर मामले को दबाने का दबाव बनाया जा रहा था।
एक अन्य याचिका का हवाला देते हुए कहा गया कि अमरदीप सिंह ग्रेवाल ने मुख्यमंत्री की पत्नी से कथित नजदीकी का इस्तेमाल करते हुए false rape case को दबाने के लिए करोड़ों रुपये की मांग की।
हुंदल की याचिका में extortion, criminal intimidation, political influence और misuse of government machinery जैसे गंभीर आरोपों से जुड़ी इलेक्ट्रॉनिक सामग्री सुरक्षित रखने की मांग भी की गई थी।
हुंदल ने यह भी दावा किया कि चहल के खिलाफ मोहाली में भी एक समान मामला दर्ज था और 24 मई को SSP Mohali से शिकायत किए जाने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई।
हाई कोर्ट ने जांच दूसरे अधिकारी को सौंपी
Punjab and Haryana High Court ने 20 जुलाई को लड़की के पिता की याचिका का निपटारा करते हुए जांच Special Director General of Police को सौंपने का आदेश दिया।
जस्टिस मंदीप पन्नू ने निर्देश दिया कि जांच ऐसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को दी जाए, जो पहले इस मामले की जांच से किसी भी तरह जुड़ा न रहा हो। जांच की निगरानी वरिष्ठ अधिकारी के स्तर से किए जाने का भी निर्देश दिया गया।
कोर्ट ने अपने आदेश में दोनों पक्षों के allegations and counter-allegations का उल्लेख किया।
कोर्ट ने आरोपों को सही या गलत नहीं माना
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर वह यह तय नहीं कर रहा है कि 5 करोड़ रुपये की कथित मांग या राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप सही हैं या नहीं।
हालांकि, कोर्ट ने माना कि मुख्यमंत्री की पत्नी के कथित हस्तक्षेप और FIR रद्द कराने के लिए 4-5 करोड़ रुपये की कथित मांग का उल्लेख एक से अधिक याचिकाओं में होने के कारण जांच की निष्पक्षता को लेकर वास्तविक आशंका पैदा हुई है।
राज्य की ओर से इन आरोपों को false, baseless and unfounded बताया गया। सरकारी पक्ष ने यह भी कहा कि लड़की और आरोपी live-in relationship में थे और विवाद मुख्य रूप से शादी का वादा पूरा नहीं होने से जुड़ा था।
CBI जांच से क्यों किया गया इनकार?
जस्टिस पन्नू ने कहा कि केवल पुलिस के खिलाफ आरोप लगाए जाने के आधार पर हर मामले में CBI investigation का आदेश नहीं दिया जा सकता। CBI को जांच सौंपना एक असाधारण कदम है और इसके लिए विशेष परिस्थितियां जरूरी होती हैं।
कोर्ट के मुताबिक, इस मामले में CBI जांच की जरूरत नहीं थी। इसके बजाय ऐसी व्यवस्था बनाई गई जिसमें स्थानीय पुलिस से अलग एक वरिष्ठ अधिकारी जांच करे और उसकी निगरानी उच्च स्तर के अधिकारी द्वारा की जाए।
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि victim और accused, दोनों को आपराधिक न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर भरोसा होना चाहिए। अगर जांच की स्वतंत्रता को लेकर वास्तविक आशंका पैदा हो, तो अदालत निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए उचित हस्तक्षेप कर सकती है।
अब NHRC notice के बाद पंजाब सरकार और पुलिस प्रशासन के सामने इन गंभीर आरोपों की जांच कर रिपोर्ट पेश करने की चुनौती है। हालांकि, अभी तक इन आरोपों की सत्यता पर कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं आया है।


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